आरती बोलने का सही तरीका और महत्व:
शनि देव की आरती शुद्ध हृदय और सच्ची भक्ति से की जाती है। भक्त भगवान शनि देव की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इस आरती का गायन करते हैं। इसे गाते समय शांत मन से ध्यान में रहें और भगवान से अपने कष्टों के निवारण की प्रार्थना करें। शनि देव की आरती का महत्व है कि इससे जीवन की समस्याओं और दुखों का निवारण होता है और कड़ी मेहनत करने वालों को सफलता मिलती है।
जय शनिदेव आरती
जय शनिदेव, जय शनिदेव, जय शनिदेव महाराज।
सूर्य पुत्र, प्रभु छाया मातु, यम के भ्राता तेजोमय॥
जय शनिदेव महाराज…
काशी नगरी पिंडी स्थान, महिमा अपरंपार अति॥
जय शनिदेव महाराज…
श्याम अंक, वक्र दृष्टि भारी, जो नहिं मानत दे दुख भारी॥
जय शनिदेव महाराज…
राजा विक्रम पर तुम पारे, शीश काटि तेल चढ़वाए॥
जय शनिदेव महाराज…
तैल चढ़त, शीश नवावत, लोहे की माला पहनावत॥
जय शनिदेव महाराज…
विनय राग दीपक गुण गावत, भार राम लक्ष्मण सेवत॥
जय शनिदेव महाराज…
समापन प्रक्रिया:
आरती के बाद घी का दीपक जलाकर भगवान शनि देव की आरती उतारें। उनके चरणों में काले तिल और तेल चढ़ाएं। सभी भक्तों को प्रसाद वितरित करें और अंत में शांति से भगवान शनि देव से आशीर्वाद लेकर वहां से विदा लें।
